विस्त्रित वेज्ञयानिक जानकारी के मुताबिक नये पैदा हुए बकरी के बच्चो में मरने के 3 मुख्य कारण होते हैं. (1) उर्जा की कमी (2) शरीर के तापमान का तेज़ी से गिरना (3) संक्रामक रोग

इन सभी बातो में पहली दो बात पशु पोषण से संबंधित हैं
- यहाँ दी गयी जानकारी में यह बताया जा रहा है की बच्चो को किस तरह कम खर्च में अच्छा पोषण दिया जा सकता है| क्यूंकी फार्म में बच्चो के पैदा होने के दो ही उद्देश्य होते हैं. (1) पशु को ब्रीडिंग के लिए तय्यार करना (2) पशु को बेचने के तय्यार करना
- दोनो उदेश्य में शुरू के तीन महीने की फीडिंग एक समान ही होती है और यहाँ पर मुख्य बात ये है की बच्चो में 5% मृत्यु दर को सीमित रखते हुए अच्छी ग्रोथ भी हाँसिल करनी होती है
- एक और बात जो कई वेज्ञयानिक विश्लेषण से सामने आई है वो ये की तीन महीने की आयु से पहले बकरी के बच्चो में मृत्यु की आशंका 70% तक होती है जिसके विभिन्न कारण होते हैं जिनमे दस्त, निमोनिया, और ET मुख्य हैं.



Regarding goat farming information we have to say that very little organized knowledge on goat farming is available on the internet. New entrepreneurs often get confused with available information on the internet. Most of the information is distracting and junk and ultimately of no use to new comers. In this section of Axonvet - Livestock & Poultry Solutions, we try to provide scientific information on goat farming in a lucid and organized way. Article written here will be practical and field oriented they might be some different from hardcore technical knowledge. We are open to taking feedback from our visitors and audience. We will be happy if somebody wants to share their experience or other feedback on articles written here. For any query please write at ibnester@gmail.com.   

Many disease conditions in goats look similar but have different etiologies, here we describe the particular condition and its possible causes.

These are the conditions responsible for Abdominal Distention – 
Bloat - Fat necrosis (rectum or colon) - Grain overload - Hypocalcemia - Intestinal obstruction - Obesity - Obstructive urolithiasis - Pelvic mass - Peritonitis - Pregnancy - Rupture of urinary bladder.

Probable causes of abortions in goats - 
Early abortions - Drugs (diazepam, xylazine, acepromazine) – Nutrition- Progesterone Deficiency - Toxoplasma
Late abortions - Bovine viral diarrhea (BVD) - Brucella - Campylobacter - Caprine herpesvirus - Chlamydia - Copper deficiency - Corticosteroids - Drugs - Foot and mouth disease - Leptospirosis - Levamisole - Listeria - Malnutrition - Mycoplasma - Phenothiazine - Q fever - Salmonella read more
खुरों की समस्या : बकरी के खुर इंसानो के नाख़ून की तरह होते हैं परंतु खुरो और नाख़ून में एक सबसे बड़ा अंतर यह होता है की खुर पैर की हड्डी से जुड़ा रहता है जबकि नाख़ून का हड्डी से कोई लेना देना नही होता. इसीलिए जब खुर बढ़ता है तो वो सीधा दबाव पैर की सबसे निचली हड्डी कॉफिन बोन पर डालता है जिससे अंदर की खाल और नरम टिशू जो हड्डी और खुर को आपस में  जोड़ कर रखते है छिल जाते हैं और पशु को असहनीय दर्द होता है.

इसकी वजह से बकरिया लंगड़ा कर चलती है और कभी कभी स्थिति यह आ जाती है की बकरिया घुटनो पर चलने लगती हैं. हालाँकि पैर में होने वाले कुछ और संक्रमण से भी ये स्थिति पैदा हो जाती है. यहाँ केवल हम खुरो के बढ़ने से संबंधित बात करेंगे read more
Whatever the conditions described here need basic knowledge of veterinary microbiology, pathology, and medicine because these conditions produce similar signs and symptoms in animal patients. 
These conditions are therefore written for veterinarians and experts involve in goat farming and management.

Bleeding Disorders
Blood loss anemia § Coccidiosis § External parasites § Fasciola hepatica § Haemonchus § Trauma - Cardiovascular - Congential afibrinogenemia (saanens) - Digestive - Hemolytic anemia § Anaplasma § Babesia § Clostridum § Copper toxicity § Eperythrozoon § Kale § Leptospirosis § Oak § Theleria - Impaired erythropoiesis § Chronic infection (paratuberculosis) § Nutritional (cobalt, copper, iron) § Toxic (fluorosis, bracken fern) - Liver and pancreas read more
Artificial insemination is a technique in which semen is collected from a buck and put into the reproductive tract of a doe. The standard procedure of inseminating does involves lifting up of their rear quarters with their front legs remaining on the ground. With the aid of speculum and pen light the cervical opening or ‘os’ is located and, under visual control, an insemination pipette is passed into or through the cervix for semen deposition. If difficulty is encountered in passing through the cervix, semen has to be deposited intra-cervically or caudal to the cervical os. read more
जानने योग्य बात:  उष्ण कटिबंधीय प्रदेशो में रहने वाले भेड़ बकरियो में कई तरह के परजीवी पाए जाते हैं जिनमे सबसे घातक परजीवी हिमोन्कस होता है जो हज़ारो की तादाद में बकरियो की अन्तो मे मिलता है और खून चूस्ता है| इस खून की कमी से बकरियो में अनिमिया नामक बीमारी हो जाती है जिससे अनेको बीमारिया और जन्म लेती है और बकरियो का वज़न तेज़ी से गिरता है


फमाचा कार्ड की प्रयोग विधि और देखने का तरीका

बराबर में दी गयी तस्वीरो में बकरी की आँखों के कॅंजॅक्टाईवा का रंग देखकर अनिमिया का अनुमान लगाया जाता है,

खून की अत्याधिक कमी से खून का पानी भी बाहर आ जाता है और जिससे जबड़े फ़ूल जाते हैं . जैसा तस्वीर में दिख रहा है.

तीसरी तस्वीर में हेमोन्कस की अत्यधिक तादाद को बकरी के अबॉमॅज़म में देखा जा सकता है. जिन बकरियो को दवाई नही दी जाती उनमे 90% तक बकरिया इससे ग्रसित रहती हैं. read more

Goat Farming Portal

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Contagious agalactia is principally caused by bacterium Mycoplasma agalactiae have also been isolated from goats with mastitis, arthritis, and occasionally, respiratory disease. The clinical signs of these infections are sufficiently similar to those of contagious agalactia for the OIE to include them as causes of this listed disease. read more
​The herding of goats is thought to have evolved about 10,000 years ago in the mountains of Iran, making goats one of the oldest domesticated animals.Goat milk and the cheese made from it was venerated in ancient Egypt with some Pharaohs supposedly placing these foods among the other treasures in their burial tombs (make are). read more
भारत में बकरियो का वितरण: भारत एक उष्ण कटिबंधीय देश हैं जहाँ 12 में से 8 महीने गर्मी रहती है इसलिए भारत में बकरियो की बहुत सारी प्रजातियाँ पाई जाती हैं. बकरी एक गरम जलवायु में रहने वाला प्राणी है परंतु कृतिम चयन से कुछ ऐसी बकरिया भी बना ली गयी हैं जो यूरॉप के ठंडे प्रदेशो में भी आसानी से रह लेती हैं. यह माना जाता है की बकरियो की उत्पत्ति ईरान और उससे सटे हुए मध्य एशिया के पहाड़ो मे हुई है और कुत्ते के बाद बकरी दूसरा पशु है जिसे पालतू बनाया गया है. बकरियो की लगभग तीस से अधिक प्रजातिया भारत में पाई जाती हैं जिनमे से सबसे अधिक प्रजातिया राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी मध्य प्रदेश में मिलती हैं . राजस्थान में पाई जाने वाली सबसे अधिक प्रचलन में सिरोही नस्ल है इसके साथ साथ तोतापरी, और सोजत भी काफ़ी लोक प्रिय हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बर्बरी और जमुनापरी बकरिया काफ़ी अच्छी मानी जाती हैं यह देखने मे सुंदर और दूध में काफ़ी अच्छी होती हैं. पंजाब में बीटल और झकराना नस्ल आम तौर से मिलती हैं, उपरी उत्तराखंड, हिमाचल और कश्मीर में चेगू, चानथंगी और गद्दी नस्ले मिलती हैं जो मुख्यतः उन के लिए पाली जाती हैं. पूर्वी भारत में ब्लॅक बंगाल नामी नस्ल सबसे अधिक प्रचलित है जिसका मीट सबसे स्वादिष्ट माना जाता है और यह एक बार में 3 बच्चे देती है परंतु यह आकार में बहुत छोटी होती है. दक्षिण भारत में ओसमनाबादी और मलबरी अच्छी तादाद में पाई जाती हैं. read more
बकरियों में वज़न पता करना क्यू ज़रूरी है

इस प्रशन के बहुत सारे जवाब हो सकते हैं परंतु सबसे पहले जो बात हमे समझनी चाहिए वो ये की नस्ल के अनुसार बकरी का वज़न किसी विशेष आयु में कितना होना चाहिए उनके स्वास्थ और उत्पादन क्षमता को जानने के सबसे आसान तरीका है. साथ ही निम्‍न वजाहे भी वज़न जानने का कारण हैं

1) फार्म में नयी बकरी लाते समय उसका वज़न मालूम होना चाहिए

2) बकरी को दवाई देते समय वज़न मालूम होना चाहिए इससे दवाई ठीक मात्रा में पहुँचती है और सही असर करती है

3) जब बकरी का वज़न ब्रीडिंग के लिए बढ़ाया जा रहा होread more